किसान और उसके साथ छल
किसान और उसके साथ छल
चुनाव आते ही हर नेता की ज़बान पे ग़रीब और किसान ही सुनाई पड़ता है परंतु शायद घोषड़ापत्र कुछ और होता है हकीकत कुछ और।
यही हाल उत्तर प्रदेश के 2017 विधानसभा चुनाव में हुआ नज़र आ रहा है। इधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ फैसले पे फैसले लें रही है,कुछ फैसले तो बहोत अच्छे है। इधर योगी सरकार ने केंद्र पर दबाव बनाना शुरू किया कि किसानो का क़र्ज़ माफ़ किया जाये। तो अरुण जेटली जी ने यू-टर्न ले लिया है। आखिर में कह ही दिया की क़र्ज़ माफ़ी नही होगी। क्या इसे ही ग़रीबो की सरकार कहते है? क्या ऐसे लोग ही ग़रीबो के मसीहा है जो अपने वादों पे कभी खरे नही उतरते? इंडियन नेशनल कांग्रेस के टाइम में थोड़ी महगाई क्या बढ़ी की लोग ऊपर नीचे होने लगे थे और आज यही महगाई पे किसी की आवाज़ सुनाई नही दे रही है।
यही हाल लोकसभा चुनाव 2014 में भी हुआ था कि किसानों का क़र्ज़ माफ़ होगा और आखिर में राजनाथ सिंह ने कह दिया की किसान क़र्ज़ माफ़ी की उम्मीद न रखे।
सरकार तो सिर्फ उद्द्योगपतियो के क़र्ज़ माफ़ करेगी ना?
माल्या जैसे लोग भारत से बाहर निकल जाये और सरकार को खबर तक न हो आखिर कैसे? जे. एन. यू. में बवाल हुआ तो लोगो को अजीब अजीब चीज़े मिल गयी लेकिन पठानकोट हमला करने वाले एस. पी. की गाड़ी लेके टहलते रहे किसी को कानो कान खबर भी न हुई।
मैं सिर्फ बी.जे. पी. की बात नही कर रहा यही हाल हर पार्टियों का है ये सिर्फ अपना फायदा देखते है । जनता मरती है तो मरे इनको कोई फ़र्क़ नही पड़ता । लेकिन फ़र्क़ वहाँ ज़रूर दिखाई देता है जहाँ इनका वोटबैंक खतरे में आ जाये। तब वहाँ आंसू भी निकलते है और दर्द भी। जहा चुनाव ख़तम साडी बाटे धरी की धरी रह जाती है।
किसान हाथ मलता रह जाता है। ग़रीब आस लागए रह जाता है और इन सब के हाथ आती है मायूसी। अमीर ऐश करते है और ग़रीब वही पड़ा रहता है।
दानिश अलमदार
चुनाव आते ही हर नेता की ज़बान पे ग़रीब और किसान ही सुनाई पड़ता है परंतु शायद घोषड़ापत्र कुछ और होता है हकीकत कुछ और।
यही हाल उत्तर प्रदेश के 2017 विधानसभा चुनाव में हुआ नज़र आ रहा है। इधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ फैसले पे फैसले लें रही है,कुछ फैसले तो बहोत अच्छे है। इधर योगी सरकार ने केंद्र पर दबाव बनाना शुरू किया कि किसानो का क़र्ज़ माफ़ किया जाये। तो अरुण जेटली जी ने यू-टर्न ले लिया है। आखिर में कह ही दिया की क़र्ज़ माफ़ी नही होगी। क्या इसे ही ग़रीबो की सरकार कहते है? क्या ऐसे लोग ही ग़रीबो के मसीहा है जो अपने वादों पे कभी खरे नही उतरते? इंडियन नेशनल कांग्रेस के टाइम में थोड़ी महगाई क्या बढ़ी की लोग ऊपर नीचे होने लगे थे और आज यही महगाई पे किसी की आवाज़ सुनाई नही दे रही है।
यही हाल लोकसभा चुनाव 2014 में भी हुआ था कि किसानों का क़र्ज़ माफ़ होगा और आखिर में राजनाथ सिंह ने कह दिया की किसान क़र्ज़ माफ़ी की उम्मीद न रखे।
सरकार तो सिर्फ उद्द्योगपतियो के क़र्ज़ माफ़ करेगी ना?
माल्या जैसे लोग भारत से बाहर निकल जाये और सरकार को खबर तक न हो आखिर कैसे? जे. एन. यू. में बवाल हुआ तो लोगो को अजीब अजीब चीज़े मिल गयी लेकिन पठानकोट हमला करने वाले एस. पी. की गाड़ी लेके टहलते रहे किसी को कानो कान खबर भी न हुई।
मैं सिर्फ बी.जे. पी. की बात नही कर रहा यही हाल हर पार्टियों का है ये सिर्फ अपना फायदा देखते है । जनता मरती है तो मरे इनको कोई फ़र्क़ नही पड़ता । लेकिन फ़र्क़ वहाँ ज़रूर दिखाई देता है जहाँ इनका वोटबैंक खतरे में आ जाये। तब वहाँ आंसू भी निकलते है और दर्द भी। जहा चुनाव ख़तम साडी बाटे धरी की धरी रह जाती है।
किसान हाथ मलता रह जाता है। ग़रीब आस लागए रह जाता है और इन सब के हाथ आती है मायूसी। अमीर ऐश करते है और ग़रीब वही पड़ा रहता है।
दानिश अलमदार

Comments
Post a Comment